टैक्स क्‍या होता हैं? परिभाषा एवं प्रकार पूरी जानकारी

टैक्स क्या हैं – टैक्‍स को आयकर कहते है। जो आय के आधार पर देश के हर नागरिक टैक्‍स जमा करते हैं।  जैसा कि हम जानते हैं, कि हमारे आसपास जो भी सावर्जनीक सुविधाएं हैं। जैसे कि बिजली, सडक, बाजार, सरकारी मैदान, सरकारी अस्पताल और सरकारी स्कूल इत्यादि। यह सभी सुविधाएं किसी भी एक नागरिक के लिए नहीं होता हैं। 

यह सारे देशवासियों के लिए होता हैं। हम अपने चारों तरफ जो भी सार्वजनिक सुविधाओं को देखते हैं। वह सभी काम भारत सरकार द्वारा किए जाते हैं। इन सभी कामों को करने के लिए सरकार सभी देशवासियों से टैक्स लेती हैं। 

आज वर्तमान में आयकर, सर्विसेज, सेल्स और जीएसटी आदि के नाम बहुत ज्यादा चर्चे में हैं। जो भारत सरकार के पास आय का सबसे बड़ा जरिया हैं। 

टैक्स क्या हैं

किसी नागरिक या संस्था द्वारा सरकार को दिया गया आय कर कहलाता हैं। जिसका उपयोग कल्याणकारी कामों पर होने वाले व्याय को पूरा करने के लिए किया जाता हैं। 

Tax Kya Hota Hai टैक्स

भारत सरकार द्वारा नागरिकों को सरकारी स्कूल, अस्पताल, सड़क इत्यादि सर्वजनिक सुविधाएं प्रदान किया जाता हैं। जिस व्यक्ति की आय बहुत ज्यादा होगी, उनसे सरकार कर के रूप में उनके आय का कुछ हिस्सा लेगी। उसे ही टेक्स कहते हैं। 

जनता द्वारा दिए शुल्‍क का उपयोग सरकार कई कामों को करने के लिए करती हैं। ताकि नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं मिल सकें। 

भारत में कर, लगान और बटोरना तीन स्तरों पर काम करता हैं।

  • केंद्रीय स्तर
  • राज्य स्तर
  • स्थानीय स्तर

केंद्रीय स्तर – इसको दो भागों में बांटा गया हैं। Custom Duty Income Tax ( सीमा शुल्क आयकार) और कॉरपोरेट टैक्स आदि।

राज्य स्तर – स्टेट गवर्नमेंट टैक्स राज्य सरकार को इस कैटेगरी के सभी कामों को जमा करने और उन्हें खर्च करने का अधिकार होगा।

स्थानीय स्तर – स्थानीय स्तर (local government) एक सार्वजनिक प्रशासन है। जो सरकारी राज्य के अंदर सबसे निचले प्रशासन स्तर पर मौजूद होता है। जैसे कि पंचायत, नगर पालिका, जिला, राज्य एवं राष्ट्र का प्रशासन होता है। जिसे राजकीय सरकार, राष्ट्रीय सरकार , संघीय सरकार आदि नामों से जाना जाता है। स्थानीय स्तर के पास वह अधिकार होते है, जो सवैधानिक रूप से उन्‍हें प्राप्‍त होते है। 

टैक्‍स की परिभाषा

देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और अपने नागरिकों को जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए टैक्‍स प्रणाली को बनाया गया हैं।

भारत में कर लगाने के लिए सरकार का अधिकार भारत के संविधान से लिया गया है। जो केंद्र और राज्य सरकारों को कर लगाने की शक्ति प्रदान करता है। भारत के अंदर लगाए गए सभी करो को संसद या राज्य विधान मंडल द्वारा पारित किया गया हैं। इसमें बदलाव का अधिकार भी सरकार के पास ही होता हैं।

टैक्स का प्रकार

1. Direct Tax

केंद्र सरकार द्वारा धन पर लगाए जाने वाले कर महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष कर हैं। आय पर लगाए जाने वाले महत्वपूर्ण कर हैं, निगम कर और आयकर। 

संपत्ति पर लगाए जाने वाले कर संपत्ति कर, उपहार कर आदि हैं। यह एक ऐसा कर होता हैं, जो सीधे जनता से लिया जाता हैं। जो केंद्र सरकार द्वारा आय और धन पर लगाए जाने वाले महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष कर हैं। प्रत्यक्ष कर कई प्रकार का होता हैं। 

1.1 आयकर

भारत में अगर आपका इनकम एक सीमा से ज्यादा होगा, तो आपको आयकर भरना पड़ेगा। एक सीमा से ज्यादा सैलरी पाने वाले का टीडीएस कटता हैं। एक निश्चित सीमा से ज्यादा बिजनेस से इनकम होने पर एडवांस कर भरना पड़ता हैं। 

इसी प्रकार एक निश्चित सीमा से ज्यादा ब्याज, किराया, इनाम, कमीशन मिलने पर भी टीडीएस कटेेेगा। इसी तरह कुछ विशेष प्रकार की वस्तुओं की खरीदारी पर टीसीएस लेने का नियम हैं। 

यह सभी आयकर का अलग-अलग रूप हैं। जिसे सरकार अलग अलग तरीके से लेती हैं। नए नए करदाताओं के लिए तो इसका मतलब समझने में बड़ी समस्या होती हैं। 

आयकर क्या होता हैं – यह एक ऐसा टेक्स होता हैं। जिसे सरकार लोगों के सालाना आमदनी (एनुअल इनकम) पर लेगी। हालांकि भारत में निश्चित सीमा से कम आमदनी वालों से आयकर नहीं लिया जाता हैं। 

सिर्फ एक निश्चित सीमा से ज्यादा सैलरी या आमदनी वालों को ही आयकर देना पड़ेगा। अलग-अलग कमाई पर अलग-अलग कर लिया जाता हैं। जैसे कि, एडवांस शुल्‍क, टीडीएस, टीसीएस, वेट टैक्स इत्यादि। 

आयकर क्यों लिया जाता हैं – किसी भी देश के सरकार का आमदनी का मुख्य जरिया टैक्स होता हैं। जो कि सरकार का उद्देश्य आवश्यक धन संग्रह करना हैं। सरकार को देश या राज्य पर अपना शासन चलाने के लिए पैसों की आवश्यकता होती हैं। जनता को सुविधाएं देने के लिए पैसों की जरूरत पड़ेगी। जो कि मुख्य रूप से कर द्वारा ही आता हैं। 

अंग्रेजी में एक कहावत हैं, Nations are made when taxes are paid. इसका मतलब यह हैं, कि जब टैक्स का भुगतान किया जाएगा, तभी राष्ट्र का निर्माण होगा। इससे आप टैक्स का महत्व समझ पाएंगे। 

इनकम टैक्स का प्रकार

भारत मेंआयकर अलग-अलग नामों से और अलग-अलग तरीकों से लिया जाता हैं। यह मुख्य रूप से कई प्रकार का होता हैं। 

टीडीएस (Tax Deducted at the source) –  

सरकार द्वारा टीडीएस देने का एक नियम हैं। एक निश्चित सीमा से ज्यादा फंड ट्रांसफर करने पर टैक्स देना पड़ेगा। जो कि सरकार के पास कर के रूप में जमा होगा। इस टेक्स को Tax Deducted at the source का नाम दिया गया हैं। संक्षेप में इसे टीडीएस कहा जाता हैं।

TDS एक सीमा से अधिक सैलरी पर भी कटता हैं। एक सीमा से ज्यादा ब्याज (Interest), इनाम (Prize money), कमीशन, किराया (Rent), दलाली (Brokerage) इत्यादि पर भी कटता हैं।

टिसीएस (Tax collected at the source) –

कुछ खास तरह के वस्तुओं को बेचते समय उनके कीमत के साथ शुल्‍क लेना पड़ता हैं। जैसे कि इमारती लकड़ी, स्क्रैप, खनिज, शराब, तेंदूपत्ता, जंगली उत्पाद, टोल टिकट इत्यादि। किसी सामान की कीमत अगर 5000000 से अधिक हैं, तो उसके कीमत के साथ टीसीएस भी लेने का नियम हैं। 

कोई दुकानदार या कंपनी किसी सामान पर उसके बिक्री कीमत के साथ शुल्‍क टीसीएस लिया जाता हैं। जिसे सरकार के पास जमा करना पड़ता हैं। अलग-अलग सामान पर टीसीएस लेने का रेट इस प्रकार रहते हैं।

  • सामान्य सामानों को बेचने पर (sales of goods) =0.10%
  • स्कैप के बेचने पर (sale of any scrap) =1%
  • कार या मोटर वाहनों की बिक्री पर (Motor vehicle any mode of payment) =1%
एडवांस टैक्स –

सैलरी के अलावा किसी अन्य प्रकार से अगर आपको 10000 से ज्यादा इनकम आमदनी होती हैं। उस पर आपको एडवांस टैक्स चुकाना पड़ता हैं। 

इसे वित्त वर्ष के दौरान ही अपनी कमाई के हिसाब से भरना पड़ेगा। कमाई का हिसाब पता चलने के पहले ही एडवांस में कर भरने के कारण इसे एडवांस टैक्स कहा जाता हैं। 

हर तिमाही पर आपको अपने अनुमानित कर का एक निश्चित हिस्सा चुका देना पड़ता हैं।

  • 15 जून से पहले = कम से कम 15 परसेंट 
  • 15 सितंबर सेपहले = कम से कम 45 परसेंट 
  • 15 दिसंबर से पहले = कम से कम 75 परसेंट 
  • 15 मार्च से पहले = कम से कम 100 परसेंट 

ध्यान दें : 31 मार्च के पहले चुकाया गया टैक्स, उसी वित्त वर्ष के दौरान चुकाए गए एडवांस टैक्स के रूप में माना जाता हैं। 

वेल्थ टैक्स –

कुछ खास तरह की प्रॉपर्टी जिनके पास होगी। उन्हें शुल्क देना पड़ेगा। भले ही उस प्रॉपर्टी से आपको कोई इनकम हो रही हो या ना हो रही हो। जैसे कि Individuals,companies,HUFs (Hindu undivided families) इत्यादि पर यह नियम लागू होता हैं। 

अगर आपको नेट wealth 300000 से ऊपर का हैं, तो आपको wealth टैक्स देना होगा 

1.2. कैपिटल गैंस टैक्स 

जो लोग किसी प्रकार की संपत्ति या महंगी चीजों को बेचकर ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। उन लोगों को भारत सरकार को कैपिटल गैंस टैक्स के रूप में भुगतान करना होगा। 

इसमें property, cars, Machinery, Businesses, Art, Bonds and Shares इत्यादि चीजें शामिल है। जिन्हें लाभ कमाने के उद्देश्य से खरीद कर रख लिया जाता है। फिर उसे कुछ समय के बाद बेच दिया जाता है।

कम समय तक रखने के बाद बेचने पर जो लाभ मिलता है। उस पर लगने वाले शुल्‍क को short term capital gains (STCG) tax कहते हैं। कुछ लंबे समय तक ऐसी चीजों को रखने के बाद बेचने पर मिले मुनाफा पर Long term capital gains (LTCG) tax देते है। 

1.3. सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स

जिन लोगों द्वारा किसी दूसरे देश में स्टॉक एक्सचेंज में किसी भी प्रकार का लेनदेन किया जाता है। उन लोगों को भारत सरकार को कर के रूप में धनराशि देनी होती है। उसे सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स कहते है। 

सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन शुल्‍क एक डायरेक्ट टैक्स है। जिसे आपको उन सिक्योरिटीज को खरीदने और बेचने पर देना होता है। जो कि भारत के स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड होती हैं।

1.4. कॉरपोरेट टैक्स 

भारत में काम करने वाली कंपनियों को कॉरपोरेट टैक्स को भुगतान करना पड़ेगा। कंपनी चाहे अपने देश की हो या किसी दूसरे देश की, अगर वह भारत की जमीन पर स्थित हैं। वह यहां अपना कारोबार करती हैं, तो उसे कॉरपोरेट टैक्स भरना पड़ेगा। जैसे की FBT ( फ्रिंज बेनिफिट टैक्स), MAT( मिनिमम अल्टरनेट टैक्स ) इत्यादि। 

Indirect Tax (अप्रत्यक्ष कर)

सरकार द्वारा उत्पादकों के कीमत में बढ़ोतरी करके नागरिकों से जो कर लिया जाएगा। उसे अप्रत्यक्ष कर कहा जाएगा। आप इसके नाम से ही समझ पाएंगे। यह एक ऐसा कर हैं, जो सरकार अप्रत्यक्ष रूप से भारतीयों से प्राप्त करती हैं। 

सेस टैक्स – 

किसी वस्तु पर भरे जाने वाले कर को बिक्री कर कहते है।  यह एक प्रकार का अप्रत्यक्ष कर है। बिक्री कर आमतौर पर पूरे देश में किसी भी वस्तु पर लगता है।  इसके लिए केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार दोनों ही आदेश जारी करते है।  हर देश की सरकार बिक्री कर को विभाजित करने के लिए खुद के सिद्धांतों का पालन करती है। फिर भी ज्यादातर देशों में सावभौमिक बिक्री कर लागू किए जाते है। 

सेल्स टैक्स के मुख्य प्रकार 

  • रिटेल सेल्स
  • होलसेल सेल्स
  • मैन्युफैक्चर सेल्स 
  • वैट

सर्विस टैक्स – 

यह एक प्रकार का कर होता है। जो मुख्य रूप से भारत में लगाए जाने वाले अप्रत्यक्ष करों में से एक माना जाएगा। वैसे तो सर्विस टैक्स के नाम से स्पष्ट हो जाएगा, कि सर्विस टैक्स किसी व्यक्ति या कंपनी द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

सर्विस शुल्‍क उन सेवा को प्रदान करने वालों पर लगाया जाता है। जो हर साल 10 लाख से ज्यादा कमाते है। इन व्यवसायों की सर्विस टैक्स रजिस्ट्रेशन प्राप्त करना चाहिए । एक बार जब वे वैसा करते है, तो उनके सभी ग्राहक अपने बिल पर 15 परसेंट का कर देते है।  उनके द्वारा दी हुई राशि सेवा प्रदाता द्वारा इकट्ठा करके सरकार को दिया जाता है। यही कारण है, कि सर्विस कर एक इनडायरेक्ट टैक्स है।

उदाहरण से समझ लीजिए कि यदि आप किसी होटल में जाएंगे। वहां आपको अलग-अलग तरह की सुविधाएं दी जाएगी। इसके लिए सबसे पहले पैसे देने होंगे। उसी के साथ कुछ ऐसी छोटी मोटी सेवाएं भी आपको दी जाएगी। जैसे रूम सर्विस या कोई और सेवा जिसके लिए आपको अपने कुल खर्च में से कुछ और राशि जोड़ कर देनी पड़ेगी। जिसे सेवा कर / सर्विस टैक्स कहा जाता है।

प्रोफेशनल टैक्स – 

प्रोफेशनल टैक्स एक अप्रत्यक्ष कर होते है।  जो उन लोगों पर लगता है। जो या तो एक पेशेवर, नौकरी पेशा करते है। या व्यापार पर कर अदा करते है।  इनकम टैक्स को केंद्र सरकार द्वारा लागू किया जाता है। लेकिन प्रोफेशनल टैक्स राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश सरकार द्वारा लगाया जाता है। अधिकतर भारत के कुछ राज्यों में प्रोफारेशनल टैक्स लगते है। जैसे कर्नाटक और महाराष्ट्र आदि। वहीं दिल्ली और हरियाणा जैसे कई राज्‍य में ऐसा कोई कर लागू नहीं होता है।

एंटरटेनमेंट टैक्स – 

एंटरटेनमेंट टैक्स एंटरटेनमेंट से जुड़े लोगो या संस्‍थाओ पर लगता हैं। जो मनाेरंजन से जुड़ी होती है। जैसे फिल्म टिकट, प्रमुख कमर्शियल शो या कोई बड़ी निजी त्यौहार उन पर मनोरंजन टैक्स लगता हैं। भारतीय संविधान के अनुसार मनोरंजन कर सूची दो के अंदर आता हैं।  इससे कमाया हुआ राशि आमतौर पर राज्य सरकार को जाता है।

प्रॉपर्टी टैक्स – 

इसे नगर निगम टैक्स या रियल एस्टेट टैक्स जैसे कई नामों से जाना जाता है। यह कर के आधार पर सिविल सेवाओं के देखभाल के लिए शहर, बार, स्थानीय नगर निकायों द्वारा लगाया जाता है। कमर्शियल और आवश्यक संपत्तियों के मालिक इस टैक्स के अंदर आएंगे।  

प्रॉपर्टी टैक्स अचल संपत्ति पर लगाया जाने वाला एक सालाना शुल्‍क है। यह स्थानीय निकाय या नगरपालिका प्राधिकरण जैसे कि पंचायत, नगर पालिका या नगर निगम अचल संपत्ति के मालिकों पर लगेगा। अचल संपत्ति में आवासीय और कमर्शियल बिल्डिंग, मकान, दुकान शामिल है। यह टैक्स खाली प्लॉट पर नहीं वसूला जाता है। बल्कि प्लॉट पर बनी इमारत पर लगाया और वसूला जाता है। 

प्रॉपर्टी टैक्स से मिले पैसों का इस्तेमाल स्थानीय नागरिक सुविधाओं जैसे सड़क और नाली की साफ सफाई और मरम्मत कचरा प्रबंधन, प्रकाश , पढ़ाई लिखाई और इलाज की व्यवस्था करने में किया जाएगा।

टोल टैक्स – 

हाईवे पर सफर करते समय रास्ते पर कई बार टोल प्लाजा आते हैं।  यहां से गुजरते हुए वाहन चालकों को टोल टैक्स देना होगा। टोल टैक्स एक खास प्रकार का कर होता हैं।  इसके अंदर सरकार वाहन चालकों से सड़क निर्माण में लगे खर्च की भरपाई करती हैं। टोल टैक्स चार पहिया वाहन जैसे कार, बस, ट्रक उससे बड़े वाहनों पर लिया जाएगा। 

सरकार टोल टैक्स के पैसों से सड़कों का निर्माण और उनका देखभाल करती है।  आज जब तकनीक के विकास से कई काम काफी आसानी से हो रहे है। ऐसे में सरकार फास्टैंग के जरिए टोल शुल्‍क ले रही है।

स्टैप डयूटी टैक्स –

एक प्रकार का गवर्नमेंट टैक्स होता है। जो टैक्स डायरेक्ट स्टेट गवर्नमेंट के पास जाता है।  जितना स्टेट गवर्नमेंट को टैक्स की जरूरत होती है ,उतना हमें भी स्टैंप ड्यूटी चार्ज चुकाने की जरूरत होती है। कहने का मतलब यह है, कि अगर आप स्टेैप ड्यूटी के जरिए कोई जमीन की रजिस्ट्री करवा लेते है। तो अगर भविष्य में किसी प्रकार की कानूनी परेशानी आती है। तब उसका रजिस्टर्ड फाइल को कोर्ट में गवाह के रूप में पेश कर सकते है।

सारांश

टैक्स के बारे में पूरी जानकारी दी गई हैं

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